आज के मुद्दा #दिल्ली______
मंगोलपुरी जो मेरा आठ वर्षो का कार्य स्थल रहा हैं, चार सौ रुपया महीने के किराएदार बिहारी मजदुर, शुबह 9 बजे से लेकर रात की 9 बजे तक लगातार आधें धन्टे की लंच समेत ड्युटि ..."
शुबह खाना बना के लंच तैयार करके निकलने से पहले पर्स मे 200 रुपय के आसपास पैसे रख लेते थे जान की हिफाजत के लीए, आते वक्त पता नही कौन दिल्ली का चोर राह घेरकर माचीस माँगने लगें ,राम ही जाने " हफ्ते मे दो चार लाश नाले या सड़को पे चाकु से गुन्दा हुआ ना मिले तो हफ्ता बेकार, वैसे हफ्ता पुरे साल मे एक आध ही हो सकता है जब मृत शरीर के दर्शन ना हो _______
भंगी .... नंगी भी इनको कहने मे मै यहां नही हिचकुंगां, तीस का पौवा सौ मे साथ "पाँच सौ दिखाओ तो बन जाए बात ..." हाहाहहहह एकदम कसम से दस थान गहना उपर से निचें, शक्ल कौनो हिरोइन से कम नही, जो भी उनकी गली से गुजरे दिवाना हुआ चला जाए उनकी अदाओ पें, खुबसुरत तो बला की उसपे खटीया के निचे इंगलीस देशी बियर की गोदाम ...."
मेगोलपुरी से जैसे ही सुल्तान पुरी जाने के लीए पैदल चले दिल्ली के गरीब मजबुर बेसहाए वहां के स्लम निवासी आधे दारु शराब मे धुत्त और आघे कही कही सड़को पे अटखेलीया करते सरेआम देखे जा सकते थेंं, तब हमको मन ही मन गर्व होता था, चलो हम मजदुर ही सही पर इनलोगो से लाख टके अच्छे तो है जहां पे हमारा पुस्तैनी घर है ...."
बात दसहरे की है, कला मंदीर " हाहहहहहहह ... ये मत समझीए की वो कला का मंदीर हैं, कलामंदीर सिनेमाघर का नाम हैं, जहां रंग बिरंग की फिल्मे आज भी लगती है विदेशी टाइप भोजपुरी से लेकर मिथुनवा तक स्वदेशी तो चारो टाइम चलती हैं, वहां पे दशहरा मे रावण जलाइ जाती है और मेला भी बहुत अच्छा लगता हैं, उस वक्त मै वही था जब बम ब्लास्ट हुआ था जिसमे आतंकी मुसलमान थे सारें, तब वो बदनाम इतना नही थे बेचारे, बस कदम रखें थे नए नए .....
मै मेला घुम रहा था बिल्कुल अकेला बिन्दास, तो एक लाँटरी पे नजर पड़ी, गोलाकार बेंत पे पड़ी जिसको लोग फेक रहे थे "दस मे पाँच " इनाम मे पारले जी न्युन्तम और सौ का नोट उच्यतम पुरस्कार, मैने आव देखा ना ताव बीस रुपय पाँकीट मे थे जिससे दस का एक चांस खरीद लिया, मैऩे फेका तो तीसरी बार मे पचास का नोट इनाम के रुप मे पड़ गया मुझें, मैने पढी थी पहले "ज्यादा लालच बुरी बला" दिमाग मे आते ही पिछला पाँकीट मे डाल मै निकल पड़ा वहां सें, कलामंदिर के मुख्य दृार से जैसे ही दस कदम आगे बढ़े भीड़ मे हमे अहसास हुआ की कोई मेरे पाँकेंट मे हाथ डाल रहा हैं, वो पैसे निकाल के जैसे ही आगे बढ़ा मै चट्ट से छलाँग लगा कर पकड़ लिया " हिम्मत नही होती उसे पकड़ने की अगर वहा किनारे पे पुलीस नही टहल रहे होते, सो जैसे ही पकड़ा उसने बोला "क्या हुआ बे .... ? मै बोला, चल निकाल पैसा नही तो मामु तेरे बगल मे हैं "बुलाउ ... " उसने निकाल के चट्ट से मेरे पाँकेट मे डाल दिया ..दो चार लोगो के सिवा कोई नही देखा, मगर जो देखा उसने पुलीस बुलाकर पकरवा दी जो पास मे ही गस्त लगा रहे थें ........
यानि ये भी चोर दिल्ली या इसके आसपास का ही था जिसे दिल्ली निवासी बोलने मे मै परहेज नही करुंगा ...... "
अब आइए खतरनाक हत्यारे से सामना कर लें, एक दिन पहले एक लड़के को जो मेरी कंपनी मे काम करता था तीन चाकु मार दिए थें, वजह पैसा नही मिला उसके पास तो, कोई पुलीस केस नही कोई हरकंप नही, चुपचाप जो हाल समाचार उस बेचारे से लिए वही जान सका मामला क्या था, खैर मै पहले से सचेत हर समय 200 रुपय रखता ही था, क्या पता कौन कट्टा या चाकु लेकर पार्क मे घेर ले, और उनका पुराना स्टाइल " माचीस है " बहाना बनाकर पास बुलाकर चार पाँच लोग चारो ओर से घेर लेते थें,और पैसे ना मिले तो चाकु वगैरा से हमला कर दें, जितने भी उधर कांड हुए लगभग ऐसे ही हुए "इसलीए दिल्ली वासीयो से सचेत ... "
एक रात मै टिफन हाथ मे लीए तकरीबन 2 बजे रात को नाइट लगाकर उस पार्क से गुजर रहा था, बिल्कुल अकेला मस्ती मे, अचानक अवाज आई माचीस हैं .... पिछे घुमकर देखा तो चार पाँच लोग शराब चरस वगैरा पी रहे थें, मै थोड़ा तेज चलकर पार्क पार कीया तो पिछे से अवाज आई, रुक बे कहा भागा जा रहा है, गालीयो सहीत " शायद माँ बाप की अच्छी परवरीस का नतीजा था, मै बगल किनारे पे पड़ा बड़ी वाली गिट्टी के पास पहुचकर टिफन निचे रखकर तीन चार उठाते ही दे मारा, और तीन चार उठाया ही था की वो भागने लगें, खैर नही भागते तो हम भाग जाते, मै छोटी दौड़ मे एक्सपर्ट था और हिम्मत भी इसी वजह से बनी रहती थी " पर पत्थर निशाने पे दो लग गया था ....... " सो टिफन उठाए और सीधें रुम पे ..." ये भी दिल्लीवासी ही थे ...!!
आगे ये लोगो की बहुत सारी सच्ची कहानी है मेरे साथ घटीत वो फीर कभी ....!!
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