फुलपैट के काट कें माई सियले रहलि हाफ पैंट ' बाकी हम आपना दिमाग से पंखा के आठो कोनवा प जउन लाल पिला फुदीना लागल रहें," उ सब बेनवा मे लागलका आठो कोना के फुदीना काट के माई के दे दिहनी, आ कहनी की इहो लगा दे...माई अचकचा के कहलस :- जा...बेनवा के फुदीनवा काट देहले..?
हमार मुह से निकल गइल की हम ना दादी काट के देहलस ह,' माई कुछुओ ना बोलली, काहेकी जानत रहली की दादी पोता के गठजोड़ मजबुत ह,'सवास ना लेवे दिहन स..से चुपचार मन मसोह के पैंट के दुनो मुहारी मे चार चार गो फुदीना लटका दिहली,"
सुबेरही हम पहिन के तैयार हो गइनि,'पलास्टीक के झोरा मे टिनहीया सिलेट कापी आ पहीला कलास के जोगार जंतर ले कें," तबले माई चिल्लइलस ...आरे दुसर पैट पहीन ले ना त धुरकच उतार दिहे मास्टर साहेब,'सब तहार जोकरई #gaरी से घुसर जाई," ना माननी बात आ पिछुत्ती से चुपचाप निकल गइनी, लोग हंसें हमार हाँफ पैट देख के, बाकी कउनो के डर ना ..पिटइबे नु करम इहे सोचतें चलल चल गइनी स्कुल.."
अब स्कुल के जे हेडमास्टर रहले उनकर नाम रहे मिश्रा जी, आ उनकर लइका बिरेन्दर सर के साथें हमार बाबुजी के यारी बहुत पुरान रहें," माने पराथना खतम होइते जइसही क्लास मे पहुचनी,' पहीलका घंटी अंग्रेजी के भेटा गइल,' आ दिन दशा खराब चलला के कारण गेटवे के सामने जगहा टिका के बइठल रही,' जइसही मिश्रा जी क्लास के भितर घुसलें, सिधे उनकर नजर हमार पैंट प पर गइल...
हाजरी बना के हमके बोलइले आ कानवा पकड़ के सिधें बाहर ले गइलें,'जेठ बइसाख के दीन रहे..कहले की "तुम ऐसे नही सुधरने वाले,..सजाय मिलल एगो गोरवा उठा के खाड़ रहऽ टिफीन के बेरा लें...बाकी प्रभु के कृपा बनल रहे हमरा पर लइकाइए सें,बिरेन्दर मास्टर ट्युसन पढ़ा के तनिका लेट पहुचस स्कुल मे,' बाकी औह दीन जल्दीए आ गइले उनका के आवत देख मन खुश हो गइल,' दुरे से एकें टाँग पर खड़ा बोल परनी,"प्रणाम चाचा"उ घुम के देखलन त एके टाँग प सुथनि खानि मुह बनवले हिलत रहनी..जइसे की पापा के यारी के चलते हम मास्टरसाहेब ना बोलके चाचा बोलावत रहनि," से ठोक देहनी आपना दिमाग भर ..
लगे आ के कहलें,' के कइलस ह तोहके एक टंगरी प खार...? हम कहनी की मिश्रा सर...@ अब उहो कुछ ना बोलले कुछ देरी ले, काहे की बाबुजी रहले मिश्राजी उनकर," आ बिखीयाह मन भर....कुछ सोच के कहले की जो भाग जो घरें...बास्ता हम आफीस मे रख देहम काल्हे ले लिहें...अब त चुपचाप बिना सोचले समझले हम फिरार...घरे गइला पर केहु के पता ना चले से चुपे से पैट सांट निकाल के बइठ गइनी फुदीनवा के काटें खातीर," माई पुछलि की काहें काटऽ तारें...? त हम कहनी की ठिक ना लागऽता...त माई ह समझत देर ना लागल उनके, बोलली ...हम पहिलही कहत रहनी की मत जो इ पहीर के....बोल के उहे काट दिहली...."
अब देखी शाम के बाबुजी जब सइकील पहुचलें घरें,' हम दुआरे प पिकीया पीआई खेलत रहनी, गली मे घंटी के अवाज सुनते हम गोली बटोर के घरे चल गइनी,' तबले बाबुजी पहुच गइले पिठे प....
बोललें...कब अइले ह घरे,' हम कह देनी की हमरा क्लास के लंच मे छुट्टी हो गइल ह...एतना सुनते तीन चार गो एगो गाली प आ दु तीन गो पिठी प जमा दिहलें,एकरा बाद कहले जो हंडील मे से आपन बस्ता ले आव..." बुझ गइनी बिरेनदर चाचा बता दिहले बात इनका से तबे खोराक मिलल ह....!!
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